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Monday, September 13, 2021
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गुरु के संसर्ग में ही निखरता है आत्म-प्रकाश

गुरु पूर्णिमा अवसर है हर शिष्य के लिए आत्म-दर्शन का। गूगल का जमाना है। प्रश्नों से अधिक उत्तर हैं। इसलिए कई प्रबुद्ध साधक सोचते हैं कि गुरु के पास क्यों जाया जाए? खासकर के युवा पीढ़ी के! शायद इसी कारण कई बार गुरु को अपनी सत्ता को सिद्ध करने के लिए अपने नाम के साथ ‘शिव’ या ‘शक्ति’ का उपनाम लगाने की आवश्यकता आ गई है। परंतु सद्गुरु इन शब्द जाल में नहीं उलझते हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य बहुत बड़ा है।

सद्गुरु ही ज्ञान-प्रदाता
सद्गुरु ज्ञान प्रदाता हैं। कृपा बरसाने वाली शक्ति हैं, परंतु इन सबके साथ गुरु ही शिष्य को संपूर्ण कर सकते हैं। उसे आत्म दर्शन करवा सकते हैं। अन्यथा आज के व्यस्त समय में कोई शिष्य गुरु के पास क्यों जाएगा?
गुरु और शिष्य के बीच एक मनभावन मोह का संबंध है। शिष्य के मन में एक व्याकुलता है गुरु दर्शन के लिए और इतनी ही बेचैनी गुरु को भी है शिष्य के लिए, क्योंकि शिष्य की आत्मा गुरु होते हैं।
अध्यात्म का अर्थ अपनी आत्मा का मनन करना। इसे मन के स्तर पर किया जाता है और इसमें सबसे बड़ा बाधक भी मन है, क्योंकि मन में शिव भाव जागृत नहीं हुआ है। शास्त्र में बताया गया है कि मन 24 तत्व और एक शिव भाव से निर्मित है। मन में अवस्थित शिव भाव जितना अधिक सक्रिय होगा, जीवन उतना पूर्ण अनुभव होगा।

पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

‘ईशावास्योपनिषद’ में आया यह श्लोक गुरु एवं शिष्य के बीच होने वाले कार्य व्यापार को बता रहा है। अखंड काल से आत्मा ब्रह्म तत्व में लीन होने के लिए छटपटा रही है। एक के बाद दूसरा जन्म आत्मा लिए जा रही है और उसे पूर्णता नहीं मिल रही है, क्योंकि कहीं ना कहीं कुछ रह जा रहा है। या तो रास्ता नहीं सूझ रहा या फिर मार्गदर्शक का अभाव है, या फिर मन नचा रहा है।
फिर सिद्धांत भी तो कितने सारे हैं- कोई कहता है, शरीर सुखा दो, ईश्वर मिलेंगे, कोई कहता है सब कुछ भूल कर ईश्वर को अपना लो, कोई पर्वत-पहाड़ पर जाने की बात करता है। सभी के अपने-अपने सिद्धांत हैं, लेकिन आखिर पूर्णता कैसे मिलेगी और किसे मिलेगी?

अमृत बिंदुओं की बरसात
पूर्णता तो गुरु के आश्रय में ही मिलेगी और जिसे पाने की इच्छा है, उसे मिलेगी। गुरु पूर्णिमा के दिन अमृत बिंदुओं की बरसात होती है। शिष्य उसमें भींग पाएगा अथवा नहीं, इसका निर्णय केवल और केवल शिष्य ले सकता है। गुरु तो अमृत ही बरसाते हैं।
गुरु पूर्णिमा वास्तव में शिवरात्रि का दूसरा पक्ष है। महाशिवरात्रि का त्यौहार प्रति वर्ष फाल्गुन माह कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है एवं गुरु पूर्णिमा नाम के अनुसार आषाढ़ की पूर्णिमा को आता है।
आम जनों के लिए शिवरात्रि शिव के विवाह की रात है, मगर साधक जानता है कि सदियों से अतृप्त आत्मा शिवरात्रि के दिन शिव से मिलने के लिए व्याकुल हो उठती है। इस व्याकुलता में विराम गुरु पूर्णिमा के दिन मिलता है, क्योंकि गुरु साधक को अपने आश्रय में ले लेते हैं।
प्रकृति में हर चीज युग्म में है। दिन है तो रात है, ऊर्ध्व गति है तो अधोगति है। इसी प्रकार अगर किसी के मन में अंधेरा है तो गुरु के पास पूर्णिमा की चांदनी है। मगर सबसे रोचक बात यह है कि गुरु इस चांदनी को आपके अंदर जगा देते हैं। फिर अंधेरे का प्रश्न ही नहीं उठता है। अपूर्णता की पीड़ा हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है।
आत्मा का स्वरूप प्रकाश है। आपके अंतर्मन का प्रकाश जितना अधिक मद्धम होगा, मंद होगा, उतना अधिक आपके व्यक्तित्व में रूखापन रहेगा, मन उदास, अशांत और बेचैन रहेगा। गुरु के पास पहुंचकर सबसे पहले शिष्य के मन की बेचैनी समाप्त हो जाती है। क्योंकि, गुरु का स्पर्श, गुरु की दृष्टि शिष्य के मन को शांत कर देती है। यह शांति शिष्य के अंदर से प्रकट होती है। उसका आत्म-प्रकाश गुरु के संसर्ग में निखर कर बाहर आता है, जिसके बाद बाहर चाहे कितना ही कोलाहल क्यों ना हो, शिष्य का मन शांत और प्रसन्न हो जाता है।

द्वंद्वातीतं गगन सदृश्यम
आत्मा के प्रकाश को प्रकट करने के लिए गुरु शिष्य के जीवन में द्वंद्व का नाश कर देते हैं। सच तो यह है कि आत्मा को तुम्हारे निर्णय से कोई विवाद नहीं है। निर्णय सही है या गलत, इस विश्लेषण में आत्मा दखल नहीं देती है, क्योंकि द्वंद मन का क्षेत्र है। आत्मा को अगर कोई समस्या है तो वह तुम्हारे अनिर्णय से है। इसका सबसे सटीक उदाहरण कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि में अर्जुन के प्रश्न हैं, खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। उसके समस्त सवाल गीता के आखिरी श्लोक पर समाप्त हो जाते हैं, गुरु और शिष्य के बीच की सारी दूरी समाप्त हो गई यहां आकर।

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थोधनुर्धर:
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुर्वा नीतिर्मतिर्मम।

प्रबुद्ध साधक समझ सकते हैं कि आत्मा का प्रकाश गुरु से वियोग होने पर मलिन हो जाता है। गुरु के साथ संयुक्त होते ही निखर जाता है।

गुरु ही शिष्य की आत्मा
गुरु पूर्णिमा प्रकट तौर पर तो गुरु से मिलने की रात है, मगर वास्तविक तौर पर गुरु पूर्णिमा अपनी आत्मा के प्रकाश को प्रखर करने की रात्रि है। गुरु वास्तव में हर शिष्य की आत्मा है। उनसे अलग होने के बाद आत्मा अनेकों प्रपंच रखती है, फिर से गुरु से एकाकार होने के लिए। इसलिए कहा जाता है कि जब शिष्य तैयार हो जाता है, तब उसे गुरु मिल जाते हैं।
इस तैयारी का नाम कर्म है। वस्तुत: मनुष्य का शरीर कर्म शरीर है। कर्म शरीर विभिन्न प्रकार के प्रयोगों का स्थल है, जहां पर हर समय मन में भावनाओं का कुरुक्षेत्र चलता रहता है। सही और गलत के बीच निरंतर द्वंद्व है, जिससे गुरु दूर ले जाते हैं।
खेत में पड़े बीज में जैसे जल के सिंचन के द्वारा अंकुर फूटता है, वैसे ही कर्म पकता है और उसका फल मिलता है। कर्म पथ पर भाग्य विभिन्न रूप धरकर अनेकों बार छलता है। इस कथा में विराम गुरु अपनी कृपा के द्वारा प्रदान करते हैं और शिष्य को वही दिलाते हैं, जो उसकी इच्छा है, पात्रता हो या नहीं।

भक्ति ही प्रेम की प्रगाढ़ अवस्था
गुरु पूर्णिमा गुरुकृपा को मन में उतारने का अवसर है, क्योंकि यहां पर एक बेहतर मार्ग का टिकट मिल जाता है। गुरु भक्ति अपने आप को मिटाने के बाद मिलती है। यह प्रेम का पथ है।
बिना प्रेम नहीं मिलते हमारे नंदलाल।
भक्ति की प्रगाढ़ अवस्था प्रेम है। प्रेम में द्वैत खत्म हो जाता है। दो की जगह सिर्फ एक बचता है- शिष्य गुरु में समाहित हो जाता है और वह गुरु बन जाता है।
गुरु पूर्णिमा शिष्य के गुरु में परिवर्तित होने की रात्रि है। इस ज्ञान के साथ जीने की शुरुआत है कि भक्ति किसी उद्देश्य के लिए नहीं की जाती है, किसी प्राप्ति के लिए नहीं की जाती है, किसी अभाव को भरने के लिए नहीं की जाती है, बल्कि भक्ति सिर्फ भक्ति के लिए ही की जाती है।
भक्ति स्वयं में संपूर्ण है। गुरु पूर्णिमा भक्ति रस में सराबोर होने का दिन है। इसके बाद किसी किस्म का अभाव नहीं रहता, क्योंकि मन पुनीत और पवित्र भावनाओं का अथाह सागर बन जाता है।

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