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Monday, September 13, 2021
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लैंगिक संवेदनशीलता और समाज

आधुनिक समाज में महिला उत्थान लिए उसका आर्थिक सशक्तीकरण जरूरी है। आज सामाजिक उतरदायित्व ,घरेलू रख-रखाव और उत्पादक कार्यों में माहिलाओं की भागीदारी बढ़ी है । बावजूद इसके असमान वेतन महिला समानता पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न है । आर्थिक हिस्सेदारी और महिलाओं के लिए अवसरों के मामले में अब भी साठ प्रतिशत लैंगिक भेदभाव किया जाता है । आर्थिक हिस्सेदारी में भाग देनें वाली महिलाओं को रोजगार के नाम पर कम पारिश्रमिक देकर उनके श्रम का दोहन किया जाता और उनके योगदान को सामाजिक श्रम के अंतर्गत नहीं रखा जाता ।अभी भी मानव श्रम की गणना में महिलाओं की अनदेखी की जाती है । महिलाओं द्वारा घरेलू काम या बच्चों की परवरिश के लिए किए जाने वाले कार्य को श्रम के रूप में नही देखा जाता । वर्तमान व्यवस्था भी किसी न किसी रूप में विभिन्न प्रचार माध्यमों से इस गैरबरबरी को बनाए रखना चाहती है । एक रिपोर्ट के मुताबिक विश्व की 1.3 अरब गरीब आबादी में से 70 % महिलाएं हैं वह दुनिया की खाद्य सामग्री के 50 % का उत्पादन करती है जबकि बदले में उन्हे मात्र 10% आय प्राप्त होती है । महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा कम संसाधनों का उपयोग करती है और पुरुषों की तुलना में उन संसाधनों पर उनका स्वामित्व भी कम है । यहां तक कि उनकी संपत्ति के रख-रखाव और नियंत्रण का अधिकार परिवार के पुरुषों के पास ही होता है ।समाज में महिलाओं की अधीनता का एक बड़ा कारण श्रम का लिंग आधारित विभाजन है ।

आमतौर पर महिलाएं भोजन बनाने ,ईंधन और पानी ईकठ्ठा करने व‌ बच्चों के देखभाल के अलावा घर से बाहर जो काम वह कर सकती है उसके लिए उन्हें कोई पारिश्रामिक नही मिलता जिसे धरेलू दायित्वों के रूप में महिलाओं के लिए अनिवार्य कर दिया जाता है ।घर के बाहर भी भेदभावपूर्ण मजदूरी के कारण महिला श्रमिकों को पुरुषों की तुलना में अधिक घंटे काम करना पड़ता है । समान पारिश्रमिक अधिनियम के बावजूद आमतौर पर महिलाओं को पुरुषों को मिलने वाली मजदूरी का 40 से 60 प्रतिशत ही मिलता है ।श्रमिक वर्ग की महिलाओं को उपलब्ध होने वाले काम कम वेतन वाले होते हैं जिनकी योग्यता उन्हे घर के पारंपरिक कामों से मिलती है । घर से बाहर मिलने वाले अधिकतर काम सफाई और देखभाल से जुड़े होते है जैसे घरों में सफाई, बर्तन, कपडे धोने और खाना बनाने के काम , नर्स ,बालबाडी शिक्षण , दाई तथा सरकारी विकास कार्यक्रमों में साथिन आदि इन कामों के लिए इन्हें काफी कम वेतन मिलता हैं ।

विभिन्न कार्यक्षेत्रों में पुरूषों के समान अपनी मेहनत से जगह बनाने के बाबजूद स्त्री सुरक्षा ,सम्मान और बराबरी के हक की लड़ाई आज भी जारी है । पिछले दशक में स्त्रियों का उत्पीडन रोकने और उन्हें उनके हक दिलाने के बारे में बड़ी संख्या में कानून पास हुए हैं ।यह सिलसिला इस दश्क में भी जारी है अगर इतने कानूनों का सचमुच पालन होता तो भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव और अत्याचार अब खत्म हो जाने चाहिए थे लेकिन दुर्भाग्यवश स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है । औरतों की स्थिति को बदलने के लिए पितृसतात्मक ढ़ाचों और धारणाओं को बदलना जरूरी है ।इसके लिए औरतों के साथ-साथ पुरूषों की स्थिति और भूमिका में बदलाव लाने के लिए घर से शुरूआत होनी चाहिए । घरेलू कामकाजों और शिशु लालन-पालन में पुरूषों की भूमिका भी तय की जानी चाहिये । भारत में लड़की के लिए सबसे बड़ी चुनौती जन्म लेना है। भाग्य से कोख में बच भी जाए तो पारिवारिक उपेक्षा के कारण शीघ्र ही अबोध बच्ची अकाल मुत्यु को प्राप्त हो जातीं है । आज सेरोगेसी की तकनीक और अल्ट्रासाउंड मशीनों ने लोगों को यह सुविधा दी है कि वह अपने बच्चे के लिंग का चयन कर सके उनके लिंग का पता लगा सके कि वह बेटा है या बेटी और अगर बेटी है तो उसे गर्भ में ही मारने का प्रबंध भी कर सके । इसमें कोई संदेह नही है कि भविष्य में डी.एन. ए तकनीकी के द्वारा लोग अपनी सोच के मुताबिक बेटे की चाहत में गर्भ में ही बेटा चुन लेगें । वास्तव में इन अपराधों के पीछे पितृसत्तात्मक समाज की अपराधिक मानसिकता काम कर रही है । लिंग चयन तकनीकों का प्रसार जिनके विरूद्ध बहुत कम सुरक्षा उपलब्ध है कन्या भ्रूण हत्या के लिए धड़ल्ले से प्रयोग किए जा रहें है । चिकित्स्कीय गर्भपात को कानूनी स्वीकृति मिलने के बाद भी अस्पतालों में अपर्याप्त सुविधाएं है जिससे बड़ी संख्या में गर्भपात होते हैं । इनसे निपटने के लिए कठोर कानून मात्र बना देने भर से समस्या का हल नही निकलेगा और न इस मानसिकता में कोई परिवर्तन हो सकेगा । यह नीति इस समझ से विमुख है कि एक पितृसत्तात्मक संस्कृति के रहते प्रजनन के मामले में स्त्रियां निर्णयकारी ईकाई नहीं है ।आज भी घर के पुरूष हो या बड़े बूढ़े वंश के लिए बेटे की चाह के चलते या तो कन्या भ्रूणहत्या करवाते या कई के बेटियों के बाद भी बेटे को जन्म देनें के लिए स्त्री पर दवाब बनाकर रखते हैं।इस प्रकार की मानसिकता और शिक्षा के अभाव में सरकार द्वारा चलाए जा रहें परिवार नियोजन की योजनाएं निरर्थक साबित होतें है और आबादी में महिलाओं की संख्या असंतुलित हो जाती है ।

घर व समाज में स्त्री सुरक्षा की समस्या को समझने के लिए उसे समाज और राजनीति की मूल समस्याओं से जोड़कर देखना होगा क्योंकि हर सदी में समाज और राजनीति जिन नियमों से संचालित होते हैं वे ही नियम स्त्री की स्थिति भी रचते हैं । अगर राजनीति और समाज की भीतरी हालात सही नही है तो स्त्री की स्थिति दयनीय ही होगी । जब तक लोगों में स्त्री के प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न नहीं होगीं । उसे देह से अलग मनुष्य के रूप में स्वीकार करने की समझ विकसित नहीं होगी तब तक स्त्री के लिए सुरक्षित समाज की कल्पना असम्भव है । राजनीतिक सत्ता स्त्री समानता का एक और महत्वपूर्ण आधारबिंदु है । महिला राजनीतिक समानता का अर्थ पुरुष के हाथों की कठपुतली बनना नहीं क्योंकि देखा गया है कि महिलायें बड़े पदों ( सरपंच से लेकर मुख्यमंत्री तक ) पर आसीन होने के बावजूद राजनीतिक अधिकारों के उपयोग में स्वतंत्र नही होती । उनकी बागडोर पर्दे के पीछे किसी पुरुष के हाथों में होती है । हमारे यहां इसके कई उदाहरण देखे गए है । ऐसी समानता का कोई अर्थ नही । ऐसे में जरुरी है कि महिलाओं को भी अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए तटस्थता के साथ- साथ स्वतंत्र विचार की कसौटी पर खरा उतरकर विश्वास प्राप्त करना होगा तथा यह दिखाना होगा कि पुरुष के मुकाबले महिलाओं की राजनीतिक प्राथमिकतायें भिन्न होने के कारण उनकी भागीदारी अनिवार्य है । इसलिए समाज ,राजनीति और कानून के स्तर पर लिंग संवेदनशीलता जरूरी है । भारतीय संविधान में महिलाओं को समानता के तमाम अधिकार दिये गए है पर सच यह है कि उन्हें हर स्तर पर अपने अधिकार पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है । आज भी पुरूष वर्चस्ववादी पारिवारिक सामाजिक संरचना में एक मध्यवर्गीय स्त्री भी आधुनिक घरेलू गुलाम ही होती है और वह आर्थिक रूप से स्वाबलम्बी हो तो भी घर के भीतर और बाहर वह बराबर की नागारिक नही होती । दशा यह है कि सड़क पर अकेली स्त्री का निकलना जोखिम भरा है । बच्चियां तक सुरक्षित नहीं यानी माहिलाओं के हक में बने तमाम प्रगातिशील और मजबूत कानून भी उनके जीवन को सुरक्षित और सहज बना पाने में नाकाम है । स्त्री समानता का सपना महिला कल्याण की कागजी योजनाओं और महज कानून बना देने भर से पूरा नही हो सकता इसके लिए जरूरी है कि समाज में स्त्री –पुरूष विभेद पैदा करने वाली सभी व्यवस्थाएं , समाप्त की जाएं तथा पुरूष वर्चस्व और स्त्री अधीनता की परंपरा को ध्वस्त करके समतामूलक समाज निर्माण की ओर बढ़ा जाए ।

विभा ठाकुर ,दिल्ली विश्वविद्यालय

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