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Monday, September 13, 2021
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कोरोनाकाल और शिक्षा में लैंगिक भेदभाव

बदलते परिदृश्य में सभी परंपरागत प्रतिमान ध्वस्त हो चुके हैं  लेकिन मनुष्य की विशेषता रही है कि उसने हर परिस्थितियों को अपने अनुकूल करने में सफलता पाई है । कोरोना के संकट काल में हमारी जीवन शैली  सबसे अधिक प्रभावित हुई हैं ।अपने दैनिक जीवनचर्या को सुचारू रूप से चलाने के लिए हम बहुत से नवाचारों को अपनाने के लिए बाध्य हुए हैं । इन नवाचारों में शैक्षणिक क्षेत्र का नाम सबसे पहले आता है । पिछली सदी के पारंपरिक ब्लैक बोर्ड और चाॅक के दौर से गुजरते हुए इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में पठन-पाठन का समूचा परिदृश्य बदल चुका है। आज की स्कूली शिक्षा नवयुगीन साधनों  से सुसज्जित होती जा रही है। जहां साधारण ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्टबोर्ड ने ले ली है तथा स्लाइड प्रोजेक्टर तथा एलसीडी प्रोजेक्टर अब हर कक्षा की अनिवार्य आवश्यकता बनते जा रहे हैं।  सोचने की बात है कि क्या यह सुविधाएं भारत के कौने कौने में उपलब्ध कर दी गई है ?अभी हम यह प्रश्न कर ही रहे थे कि किताबी शिक्षा से मशीनी शिक्षा का  आधुनिक नवाचार ने पहली वाली व्यवस्था को संशय में डाल दूसरी वैकल्पिक व्यवस्था पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया ।

भारत में 2015 से  डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई।लगभग 5 वर्ष बाद आज हम डिजिटल होने की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं । 15 मार्च 2020 से देश भर ऑनलाइन पठन-पाठन चल रहा है जिससे 25 करोड़ स्कूली बच्चे और लगभग 8 करोड़ के आसपास उच्च शिक्षा से जुड़े बच्चे अध्ययन अध्यापन कर रहे हैं। इस नई व्यवस्था को लागू करने से पहले हमें इसके सभी पहलू और पर विचार करने की आवश्यकता है । अभी तक दुनिया के विकसित देशों में ऑनलाइन शिक्षण पद्धति का कोई ठीक-ठाक स्वरूप निर्धारित नहीं हो सका ऐसे में हमें अपने देश की  बुनियादी आधारभूत  संरचना को देखते हुए सोचना पड़ेगा कि ऑनलाइन शिक्षा पद्धति हमारे सर्व शिक्षा अभियान को सफल बनाने में मदद करेगा ?

आनलाइन पठन पाठन का विकल्प  शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने जा रहा है लेकिन इस माध्यम के प्रयोग ने शिक्षा में लैगिक भेदभाव की चुनौतियों ने हमारा ध्यान आकर्षित किया है । भारत में बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी का अभाव व इंटरनेट की कम गति और उसकी उपलब्धता ई-शिक्षा की राह में सबसे बड़ी चुनौती है।वर्चुअल पढ़ाई के कारण लड़कों और लड़कियों के बीच का फर्क  इस अवधि में पहले से ज्यादा गहरा गया है । इस अंतर को डिजिटल डिवाइड  का नाम दिया गया । डिजिटिल डिवाइड लोगों के बीच का वो फासला है जो इंटरनेट की उपलब्धता से जुड़ा है । जो बच्चे गांवों में हैं, पहाड़ों पर हैं या किसी भी दूरदराज के ऐसे इलाके में हैं, जहां बिजली, इंटरनेट नहीं होता, वहां आनलाईन शिक्षा का लाभ इन बच्चों तक पहुंचाना असंभव है । लेकिन जहां ये सुविधाएं हैं भी तो देखा गया है कि उसका लाभ लड़कियों को लड़कों के मुकाबले कम ही मिल पाता है ।

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया, 2019 की एक रिपोर्ट अनुसार  भारत में 67 प्रतिशत पुरुष और 33 प्रतिशत महिलाएं ही इंटरनेट का उपयोग करती हैं।  ग्रामीण भारत में पुरुषों की तुलना में  सिर्फ 28 प्रतिशत महिलाएं ही इंटरनेट का उपयोग करती हैंकहने का अभिप्राय यह है कि शिक्षा में डिजिटल माध्यम लड़कियों के लिए लाभकारी साबित नहीं हो रहे ।स्कूल बंद होने का मनोवैज्ञानिक असर भी लड़कियों पर ज्यादा दिख रहा है ।इसकी वजह ये है कि वो लगातार घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं ।खुद चाइल्डलाइन इंडिया ने माना कि लॉकडाउन के दो हफ्तों के भीतर ही उनके पास आने वाले बच्चों के कॉल 50 प्रतिशत तक बढ़ गए है  इनमें से ज्यादातर कॉल उन लड़कियों के थे, जो बंदी के दौरान कई तरह की हिंसाएं झेल रही है । धरेलू हिंसा और तनाव के माहौल में आनलाईन शिक्षा से जुड़ना इन बच्चियों के लिए संभव नहीं हो पाता । बढ़ती उम्र की बच्चियों जो  स्कूल नही जा पा रहीं उनपर विवाह करने का दबाब भी बढ़ रहा है ।राइट टू एजुकेशन फोरम  ने सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज (CBPS) और चैंपियंस फॉर गर्ल्स एजुकेशन के साथ मिलकर देश के 5 राज्यों के 3176 परिवारों पर हुए सर्वे में उत्तर प्रदेश के 11 जिलों, बिहार के 8 जिलों, जबकि असम के 5 जिलों को शामिल किया गया वहीं तेलंगाना के 4 और दिल्ली का भी 1 जिला इसमें शामिल है ।.आर्थिक तौर पर कमजोर तबके के परिवारों से बातचीत के दौरान लगभग 70% लोगों ने माना कि उनके पास खाने को भी पर्याप्त नहीं है.।ऐसे हालातों में पढ़ाई और उसमें भी लड़कियों की पढ़ाई सबसे ज्यादा खतरे में है। यूनिसेफ इंडिया के एजुकेशन प्रमुख टेरी डर्नियन कहते हैं कि महामारी के दौरान लड़कियों की मुसीबतें बढ़ी हैं, उन्हें पढ़ाई में प्रोत्साहन देने की बजाए देखभाल के काम सौंपे जा रहे हैं।

ई-लर्निंग के दौरान लड़कियों के पीछे जाने का एक कारण यह भी है कि वे स्कूल न जाने के कारण घर के कामों में लगा दी जाती हैं। तकरीबन 71 प्रतिशत लड़कियों ने माना कि कोरोना के बाद से वे केवल घर पर हैं और पढ़ाई के समय में भी घरेलू काम करती हैं। वहीं केवल 38 प्रतिशत लड़कों ने बताया कि उन्हें घरेलू काम करने को कहा जाता है। यही कारण है कि 56 प्रतिशत लड़कों की तुलना में सिर्फ 46 प्रतिशत लड़कियों ने माना कि उन्हें पढ़ाई करने के लिए समय मिल पाता है।शहरी और ग्रामीण भारत में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या में एक बड़ा अंतर है। शहरी भारत में इंटरनेट की पहुंच लगभग 64.85 प्रतिशत है, वहीं यह ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ 20.26 प्रतिशत है। गांवो में  लगभग 47% बच्चों के पास ही फोन की सुविधा है, जिनमें से 31% के पास स्मार्ट फोन है ।इसमें भी ज्यादातर लड़कियों को पढ़ने के लिए फोन नहीं मिल पा रहा । गांवो मे ही नहीं शहरों मे भी मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा है तो उतने समार्ट फोन नही कि सभी बच्चों को उपलब्ध हो सके । उसमें भी  लड़की की जगह लड़के की पढ़ाई को प्राथमिकता मिलती है ।

कोरोनाकाल में यूं तो शैक्षिक जगत ने वैकल्पिक माध्यम के द्वारा शिक्षा से बच्चों को जोड़े रखने का विकल्प ढूंढ लिया लेकिन प्राईवेट स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलचाहे  गांव  हो या शहर दोनों जगह बच्चों की शिक्षा बुरी तरह से प्रभावित हुई । क्योंकि इन स्कूलों में समाज का सबसे पिछड़े वर्ग के बच्चे आतें है ।  सरकारी स्कूलों में  गरीब और समाज के पिछड़े वर्ग के बच्चों को लुभाने के लिए बच्चों को मिड डे मील के साथ  लड़कियों की बुनियादी चीज़ों की पूर्ति जैसे सैनिटरी पैड और मिड डे मील से बहुत मदद मिल जाती है परंतु लॉकडाउन में ऐसी प्राथमिक स्तर की चीजें न मिल पाने के कारण भी समस्याओं का सामना करना पड़ा । दैनिक दिनचर्या में स्कूल के  6-7 घंटे लड़कियों के विकास के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ करते थे। लड़कियां कई तरह की समस्याओं से दूर रहा करती थीं। भावनात्मक और शारीरिक तौर पर मज़बूत आधार मिल जाता है। दुर्भाग्य से बंद स्कूलों के कारण लड़कियों  मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार होने के लिए मजबूर थी ।

 लिंग भेद के कारण लड़कियां के लिए ऑनलाइन पठन-पाठन में पिछड़ने की संभावना सबसे अधिक है । कारण हमारा समाज पुरूष प्रधान समाज है जहां  शुरू से यही तो पढ़ाया जाता है – राम पाठशाला जा ।राधा खाना पका ।राम आ बताशा का ,राधा झाड़ू लगा। ऐसे में लड़कियों के लिए यहां मंच सर्वसुलभ हो पाएगा इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है ‌दिल्ली जैसे महानगर में सरकारी योजनाओं के लोभ में जो अभिवावक अपनी बच्चियों को स्कूल भेज रहे थे क्या घर बैठे अपनी बच्चियों को घरेलू कामों से मुक्त कर  पढ़ने के लिए मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध करा पाएंगे ? ऐसे कई प्रश्न है जिनके उत्तर खोजकर  चुनौतियों को समझने की आवश्यकता है ।

 अभी भारत में ई-शिक्षा अपने शैशवावस्था में है।   वर्ष 2025 तक भारत में इंटरनेट उपयोगकर्त्ताओं की संख्या 900 मिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है, जिसके साथ  ई-शिक्षा के क्षेत्र में एक विशाल बाज़ार तैयार होने की संभावनाएँ हैं। डिजिटल इंडिया के सपने को सच करने की दिशा में यह एक सराहनीय कदम  माना जाएगा लेकिन आधारभूत संरचना के विकास के साथ लैंगिक भेदभाव को खत्म करने की दिशा में काम करने की आवश्यकता है।

डॉ विभा ठाकुर सहायक प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

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