23.1 C
Ranchi
Tuesday, September 14, 2021
Home जीवन शैली किस्से कहानियों का संसार

किस्से कहानियों का संसार

पिछ्ले कुछ दशकों से बाल साहित्य को अलग करने की मांग उठने लगी  है। जबकि  प्राचीन समय में लोक के किस्से कहानिय़ों से ही बच्चों का मनोरंजन किया जाता था । महाभारत और रामायण के लोक संस्करण इसके उदाहरण हैं जिसे बाल साहित्य के श्रेणी में भी रखा जा सकता है। पीढ़ी दर पीढ़ी  सुनाए जाने वाली लोककथाओं का जन्म किस काल में हुआ ये तो ज्ञात नहीं लेकिन मनोरंजन के साथ उपदेश देना लोक कथाओं का मुख्य प्रयोजन होता था।लोककथाओं में बच्चों के अंतर्मन को छू लेने, प्रभावित करने की अद्भुत क्षमता को देखते हुए ही अनेक साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने बच्चों की शिक्षा में लोककथाओं की गहरी उपयोगिता को स्वीकार किया है ।‌ बच्चों को अक्षर ज्ञान के अतिरिक्त सामाजिक समीकरणों को समझने में भी ये लोककथाएं उपयोगी होती है । कारण समाज की सामंती मानसिकता के  प्रति प्रतिरोध के स्वर इन लोक कथाओं में प्रतीकों के साथ अभिव्यक्त होते है । इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं । जंगल के पशु पक्षियों की कथाओं में  सत्ता के प्रति उपेक्षा,  व्यंग्य और घोर तिरस्कार की भावना व्यंजित रहती है । फेबल’ कही जाने वाली कथाओं में जंगल का राजा शेर दिखाया जाता है ।सामंती सत्ता का प्रतीक  यह ‘शेर’ विश्व के लोक साहित्य का एक  महत्वपूर्ण पात्र  है । शेर की राजसत्ता को जंगल के सभी निवासी एकमत से स्वीकार करते हैं । बावजूद इसके शेर कभी गिलहरी के हाथों ठगा जाता है तो कभी खरगोश की होशियारी उसे वेबकूफ साबित करती है ।यानी जंगल का सर्वशक्तिमान जानवर शेर को  जंगल के छोटे छोटे और निरीह जानवरों द्वारा बार बार परास्त होते दिखाया जाता है । वास्तव में लोक में सामंती मानसिकता के प्रति विरोध का स्वर इन  कहानियों को मुखर बनाती है जो बालमन को अन्याय के प्रतिकार के साथ उसके विरोध  के लिए प्रेरित करती हैं। दादा- दादी,नाना- नानी जब  आज भी ‘कौआ हांकनी’ या काग उड़ानी रानी की  कहानी सुनाते है जिसमें रानी के नवजातों को राजा के आदेश से यह कहकर फिंकवा दिया जाता है कि इस रानी ने पत्थर पैदा किए हैं ।पत्थर कहकर ताल में फेंके गए शिशु तालाब के कमल कुमुदनी बनकर जीवित रहते हैं । ऐसी कहानियां बच्चों को संवेदनशील बनातीं हैं और सत्तावान ताकतों के अन्याय का विरोध करने की भावना के साथ सही और गलत को पहचाने की दृष्टि देतीं हैं ।

नव तकनीक के आगमन के बाद बाल मनोरंजन के पारंपरिक साधन मौखिक कहानियों के स्वर्णिम दौर की समाप्ति और एक नए दौर की शुरूआत भले ही हो गई है लेकिन मौखिक कहानियों का विकल्प टीवी पर दिखाए जाने वाले कार्टून और सिनेमा नहीं हो सकते। माना गया है कि दृश्य  माध्यमों की तुलना में मौखिक कहानियां बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ातें है । यही कारण है कि इधर कुछ दशकों से बच्चों के लिए मौखिक कहानियों की मांग पुनः होने लगी है तथा स्कूलों में मौखिक कहानियों को लौटाने की बात की जाने लगी है ।एक बड़े व्यवसाय की संभावना देखते हुए प्रकाशन उद्योग ने भी बच्चों की दुनिया में बाल साहित्य के बाजार की खोज करते हुए ‘स्टोरी टेलिंग’ के कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया । लेकिन ऐसे कार्यक्रम ज्यादातर शहरों में ही देखे जा सकते हैं ।

शहरीकरण के कारण संयुक्त परिवारों के विघटन ने  हम सबको आत्मकेंद्रित कर अकेला कर दिया है यह अकेलापन सिर्फ व्यस्कों  में ही नही बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रहा है । एकल परिवारों में दादी नानी के दुलार से वंचित बच्चों के लिए अब न कोई पड़ोस है और न कोई मुहल्ला जहां बच्चे शैतानियां करते हुए पड़ोसियो के उलाहाने सुनवाए । बच्चों की दुनिया स्कूल और घर के बीच सिमट कर रह गयी है।ऐसे में यथार्थ से अलग आभासी दुनिया बच्चों को लुभाने लगी है और मोबाइल, पी एस पी और कंप्यूटर उनके खेल मनोरंजन के साधन बन गए हैं। मशीनों के साथ खेलने के लिए मजबूर बचपन आज  बहुत अकेला है ।एकल परिवारों के चलन के कारण संयुक्त परिवारों के सुख और दुख से अंजान बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी के प्यार से वंचित हो गए।आर्थिक संपन्नता की चाह में  नौकरीपेशा माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है । इलेक्ट्रॉनिक गैजेट  उनकी भावात्मक जरूरतें को पूरी नही करते और इस कारण उनकी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति कमजोर पड़ने लगती है तथा उनका सामाजिक दायरा संकुचित होने लगता है।  मशीनों द्वारा बच्चों का मनोरंजन का ध्येय तो पूरा हो सकता है लेकिन  दादी-नानी की कहानियों के द्वारा दिए गए अनुभवों और नैतिक शिक्षा का  विकल्प वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया नही ले सकता । टीवी ,सिनेमा जैसे दृश्य माध्यम हमारी काल्पनिक शक्ति को अपने अनुसार नियंत्रित करने का काम करतें हैं जबकि मौखिक कहानियां बच्चों की रचनात्मक क्षमता को बढ़ाने का काम करतीं है ।लोक किस्सों में व्याप्त मायवी संसार को समझने के लिए बालक अपनी कल्पना द्वारा तमाम जिज्ञासाओं का समाधान पाता है और कहानी के पात्रों के सुख दुख में शामिल होकर संवेदनाओं को पहचाने की क्षमता के साथ तार्किक शाक्ति का विस्तार करता है। । इन कथाओं का मुख्य उद्देश्य  नैतिक मूल्यों और अनुभवों  को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे पहुंचाना होता है | बच्चों के लिए उपदेशात्मक बातों से ज्यादा असरकारी है कहानियां। बच्चों को यदि यह कहा जाए कि झूठ नहीं बोलना चाहिए तो शायद भोला मन यह बात न समझ पाए लेकिन यदि उसे झूठ बोलने वाले बालक की कहानी सुना दी जाए जो हमेशा  शेर आया ,शेर आया झूठ बोलकर गांव वालों को परेशान करता था लेकिन एक दिन जब सचमुच शेर आया और उसने गांव वालो को आवाज दी , तो उस दिन गांव वालों को लगा बालक हमेशा की तरह झूठ बोल रहा है और कोई भी उसकी मदद के लिए नही आया ।संकट के समय जब कोई नहीं पहुंचा तब बालक को  झूठ बोलने की आदत के लिए पछतावा हुआ और उसने झूठ न बोलने का प्रण किया …यह कहानी बालमन को झूठ न बोलने का संदेश बड़ी आसानी दे सकती है बजाय उपदेशात्मक बातों के । इसलिए माना गया है कि जहां कोरा ज्ञान और उपदेश असफल होता है, वहाँ कहानियां अपना प्रभाव दिखाती है । कथात्मक उपदेश के प्रभाव को देखकर ही लिखित साहित्य की शुरुआत हुई ।

 लोक कहानियां  बच्चों को कहानी की प्रक्रिया समझाने में मदद करती है ।  वह अपनी कल्पना से स्वयं भी कहानी गढ़ने लगते हैं ।इन कहानियों की लोचशीलता के कारण बच्चे अपनी कल्पना से इसे खुद आगे बढ़ा सकते हैं। इसलिए यह कहानियां बच्चों को रचनात्मक बनाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण  मानी जातीं है। फुदगुद्दी कहानी के उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है जहां एक चिड़िया दाल के दाने को पाने के लिए बड़ी सी बडी चुनौतियों का सामना बुद्धिमानी से करती है और अपनी निर्भीक, मुखरता से अपना हक प्राप्त करती है ।इस कहानी को हर बच्चा अपने अनुसार अलग अलग कड़ियों से जोड सकता है ।इस प्रकार की वर्णनात्मक लोक कथाएं, बच्चों की भाषा विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके साथ ही उन्हें घटनाओं का दोहराव भी अच्छा लगता है। उपरोक्त कहानी में बार बार चिड़िया हर किसी से कहती है -खूंटे में मोर दाल बा का खाऊं का पीऊं का ले परदेश जाऊं… यह दोहराव उन्हें कहानी सुनने के लिए प्रेरित करता है।लोक कहानियों के बीच बीच में पंक्तियां या छंद का महत्व उसी प्रकार से है जैसे बच्चों की कविताओं में लय व तुक का महत्व होता है। शोध की दृष्टि इन कहानियों में और भी बहुत  कुछ है जिन्हें खोजा जा सकता हैं ।

भारतीय समाज की  बहुसांस्कृतिक विशेषताओं से परिचित होने के लिए लोक कहानियां को पढ़ा और पढ़ाया जाना जरूरी है क्योंकि ये कहानियां किसी किताब से न होकर समाज के अनुभवों से आती हैं जिनमें संस्कृति, समुदाय, पर्यावरण, इतिहास, भूगोल इत्यादि का समृद्ध ज्ञान समाया रहता है।

डॉ विभा ठाकुर, सहायक प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय।

सबसे लोकप्रिय

अखिलेश ने कहा, योगी बताएं, कानपुर का अपराधी किसके संपर्क में रहा

लखनऊ (एजेंसी)। हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे का नाम लिये बिना समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार से सवाल किया है...

श्री श्री सूर्यदेव सिंह स्मृति गुरुकुलम के छात्रों ने लहराया परचम।

धनबाद।सीबीएसई 12 का परिणाम सोमवार को घोषित हुआ। श्री श्री सूर्यदेव सिंह स्मृति गुरुकुलम, धनबाद के छात्रों ने अपना परचम लहराया। विद्यालय...

बॉलीवुड में शायद ही स्टारडम हासिल कर पायें ये स्टार किड्स

बॉलीवुड में इन दिनों स्टार किड्स का बोलबाला है। सारा से लेकर जाह्नवी तक सभी अपने माता-पिता के नक्शे कदम पर चल...

सात हजार किलोमीटर उड़कर भारत आए राफेल

नई दिल्ली (एजेंसी)। सात हजार किलोमीटर की यात्रा तय करके फ्रांस से भारत पहुंचे पांच राफेल विमानों ने अंबाला एयरबेस पर लैंडिंग...

भारत को बराक-8 मिसाइल डिफेंस सिस्टम देगा इजरायल!

लद्दाख में 15 जून को हुई हिंसक झड़प के बाद से भारत और चीन के बीच तनाव चरम पर है। दोनों देशों...

बुकर पुरस्कार की सूची में भारतवंशी लेखिका अवनि दोशी का नाम

लंदन (एजेंसी)। भारत के लिए गौरव की बात है कि दुबई में रहने वाली भारतवंशी लेखिका अवनि दोशी समेत 13 लेखकों के...

हाल का