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Saturday, June 12, 2021
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मणिपुर की लांगपी कला

लांगपी हैम के नाम से जाने जानी वाली कला (काली मिट्टी के बर्तन बनाने की कला) नागा जनजातियों द्वारा शुरू की गई। इस कला की विशेषता यह है कि इसमें घड़े(बर्तन )बनाने के लिए चाक का प्रयोग नहीं किया जाता। 2007 में पदम श्री से सम्मानित नीलमणि देवी के अथक श्रम ने इसे अंर्तराष्ट्रीय पहचान दिलवाया ।चाक के बिना मिट्टी के बर्तन गढ़ने की मणिपुरी औरतों अनूठी शैली सबको हतप्रभ करती है।मणिपुर में थाउबल जिले के चैयरान, सांगमई एवं योंगजाऔ गांव तथा इंफाल जिले के आंद्रो गांव में मिट्टी का काम होता है। नीलमणि देवी मणिपुर के थोंगजाओ गांव की रहने वालीं हैं।उन पर देवी पंथोइबी की विशेष कृपा है। उनकी इस कला के लिए भारत सरकार द्वारा 1992 में राष्ट्रपति द्वारा मास्टर क्राफ्ट्स मोमिन पुरस्कार और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा तुलसी सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है।

पुरातात्विक सर्वेक्षणों से यह ज्ञात होता है कि विश्वभर में चाक के अविष्कार के पहले हाथ से ही मिट्टी के बर्तन बनाने की कला विद्यमान थी।मिट्टी के बर्तन कब से आग में पकाए जाने लगे, इसका समय तो ज्ञात लेकिन नील की घाटी की खुदाई में उपलब्ध पकी हुई मिट्टी के बर्तन को देखकर कहा जा सकता है कि यह अनुमानत: 13,000 वर्ष पुराने हैं।

Longpe art, Manipur,

मणिपुर के लगभग 200 घरों में स्त्रियां मिट्टी का काम करतीं हैं और इनके काम की इंफाल के बाजार में बहुत मांग है। नीलमणि देवी ने मिट्टी के बर्तन बनाने का काम अपनी मां से सीखा था। उस समय मां और गांव की तमाम स्त्रियां मटके की सतह को ठीक करने के लिए सिर्फ एवं कांगखिल के बीज (इमली के बीज जैसा किंतु आकार में उससे कई गुणा बड़ा होता है ) का प्रयोग करती थी लेकिन नीलमणि ने अपने बनाए घड़े को एक बार इतना चमकाया कि वह कांग के बीज की तरह चमकने लगा। घड़े की चमक को देखकर मां चकित रह गईं और उस दिन से नीलमणि की कला की एक अलग पहचान होने लगी।

मणिपुर में कुम्हारों के बीच यह कथा प्रचलित है कि राजा नोदा लाईरेन पार्खब के समय तक मणिपुर में औरतें पेन्थाईबी/पंथोबी की दी गई विद्या भूल चुकी थीं और बहुत भद्दे आकार के बर्तन बनाने लगीं थीं।वे गीली मिट्टी का गोला लेती और उसमें अपनी कोहनी से गड्डा कर के बर्तन बना लेतीं थी। तब राजा ने नूरा खोंदोले नामक पेड़ का फल कुम्हारिनों को दे आदेश दिया कि वह इस फल जैसा सुंदर घट बनाएं और तब से धीरे-धीरे मणिपुर की कुम्हारिनें फिर से सुघड़ बर्तन बनाने लगीं। कहा जाता है कि उपयोगिता ने ही बर्तनों के आकारों को जन्म दिया। आदिम युग में पत्थरों को पात्र के रूप में प्रयोग करते हुए उसे बाद में फलों और सब्जियों का आकार दिया जाने लगा।खुदाई में प्राप्त कटहल और नारियल के आकारो के बर्तनों के अवशेष इसके उदाहरण हैं।

लांगपी शिल्प की उत्पत्ति का श्रेय देवी पंथोबी को दिया जाता है, जो इस कला निर्माण की जननी हैं। यही कारण है कि लांगपी पात्रों का उपयोग बच्चे के जन्म और शादी जैसे उत्सव के अवसरों पर अनुष्ठान करने में किया जाता है। इनके निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में दो तरह के चट्टानो का इस्तेमाल होता है। एक मौसम और वायुमंडल के प्रभाव से क्षरित हुई चट्टानें और दूसरी सर्पिल चट्टानें।स्थानीय निवासियों के मुताबिक ऐसी चट्टानें सिर्फ लांगपी में ही मिलती हैं। ऐसा माना जाता है कि एल्युमिनियम के बर्तनों के चलन में आने से पहले तांगखुल नागा जनजाति के लोग मुख्य बर्तनों के रूप में काले पत्थर के बड़े-बड़े बर्तनों का ही इस्तेमाल करते थे। एक जमाने में इन बर्तनो को शाही बर्तन भी कहा जाता था क्योंकि उस वक्त मणिपुर के संपन्न वर्ग के लोग ही ये बर्तन खरीदने की क्षमता रखते थे। इन बर्तनों में रखा खाना चूल्हे से उतारने के काफी समय बाद तक गर्म रहता है। बर्तन में इस्तेमाल किए गए कच्चे पदार्थ बिल्कुल कुदरती होते हैं और इनमें कोई रसायन इस्तेमाल नहीं किया जाता। जिसकी वजह से उनमें बना खाना सेहत के लिए बिलकुल हानिकारक नहीं होता। इन्हें बनाने के लिए इसकी मिट्टी में गाढ़ापन लाने के लिए चट्टानी पत्थरों को पीस कर उसको पानी के साथ 5-3 के अनुपात में मिला लिया जाता है। इस हल्के भूरे मिश्रण को पूरा दिन गूंथने के बाद शुरुआती स्लैब बनाने के लिए एक लकड़ी के तख्ते पर चपटा फैला लिया जाता है।इस प्रक्रिया को लैपाक नोएबा कहते हैं। फिर इसे मोडकर सिलेंडर का आकार दिया जाता है।इसे चथुल हापा कहतें हैं।इस सिलिंडर नुमा मिट्टी को मुलायम कपड़े की चौड़ी पट्टी फुनान फददी को पानी में भिगोकर पात्र के ऊपरी खुले मुंह पर लपेटकर दबाते हुए स्वयं बर्तन के इर्द-गिर्द चाक की तरह घूमते हुए पहले उल्टी दिशा में और बाद में घड़ी की सूई की दिशा में।इस प्रक्रिया को मपान नानबा कहते हैं। जिससे घट की गर्दन एवं मुंह तैयार हो जाते हैं। घट के इस ऊपरी भाग के थोड़ा सूख जाने पर उसे लकड़ी से पीटने (पूजई) तथा पत्थर (नूड.) की सहायता से पीट पीटकर बड़ा करते हैं। बर्तन की भीतरी भाग को सीप या कांग के बीज से सफाई करते हैं और ऊपरी भाग को बीज या चिकने पत्थर की सहायता से धिस धिसकर चमकाया जाता है।

अनोखी बात यह है कि लांगपी बर्तनों को आकार देने के लिए कुम्हार के चाक का प्रयोग नहीं किया जाता। हर बर्तन को सांचों और औजारों एवं हाथों से ही आकार दिया जाता है। एक बार जब गढ़ी हुई मिट्टी सूख कर सख्त हो जाती है तब उसको खुली भट्टी में 1200 डिग्री सेंटीग्रेड से भी ज्यादा तेज ताप में 5 से 7 घंटे तक पकाया जाता है। धुंए एवं लपटों को आंशिक रूप से किसी निश्चित जगह पर स्थापित करने के लिए उपले व लकड़ी के छोटे टुकड़ों को घट की सतह पर जमावट करके पकाया जाता है।जहां काले चिह्न चाहिए हों उन हिस्सों पर उपले के टुकड़े रखकर उसे ठीकरे से ढक दिया जाता है। इन पर काले धब्बे वाले डिजाइनों के लिए कलाकार पकाते समय छोटी बड़ी लपटे,तेज या धीमी आंच आदि से घट पर चिह्न बनाने के लिए इनकी सुंदरता को निखाराने के लिए अपनी कल्पना शक्ति का प्रयोग करता है।धुंए एवं लपटों को आंशिक रूप से किसी निश्चित जगह पर उठाने के लिए लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों के घट की सतह पर जमावट करके ही डिजाइन तैयार किया जाता है।जहां काले निशान चाहिए हो उन हिस्सों पर उपले के टुकड़े रखकर उसे ठीकरी से ढक दिया जाता है। इन प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद एक घट पूरी तरह से उपयोग के लिए तैयार किया जाता है।

कोई भी कलाकार संस्कृति और परंपरा में गहरी पैठ के साथ ही अपनी पहचान बना पाता है साथ ही अपनी विशिष्ट पहचान से वह परंपरा को भी नवीन रूप देकर उस कला का उत्थान करता है। कहा जा सकता है कि नीलमणि देवी ने इस लोककला को अपनी साधना और श्रम के बल अपने नवीन प्रयोगों के साथ वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। साथ ही स्त्री के नैसर्गिक रचनात्मक एवं सृजनात्मक क्षमता का बेजोड़ उदाहरण प्रस्तुत किया।

डॉ विभा ठाकुर ,सहायक प्रोफेसर ,दिल्ली विश्वविद्यालय

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